212 1222 212 1222
कहकहों की राहों में सिसकियाँ दबी सी है
रिश्तों के निबाहों में तल्खियां दबी सी है/1/
गुजरे इन हयातों के तरजबे नये हर दिन
वक्त के ये लम्हों में शोखियां दबी सी है/2/
शोर दिल के बाहर तो खूब सुनते हैं लेकिन
क्यूँ दिलों के भीतर खामोशियां दबी सी है/3/
बदचलन सी आवारा नींदें शब भटकती है
मन में ख्वाब के कुछ बेचैनियां दबी सी है/4/
फिर लिबास तहजीबी ओढ़े फिरते हैं दर दर
अपने दिल में अब तक नादानियां दबी सी है/5/
दर्द दे के पुछे है हाल चाल कैसा है
हर सवाल पर उनके फब्तियां दबी सी है/6/
गर्द झाड़ कर दिल के शिकवे सब मिटाने है
फुरसतों पे कितनी मजबूरियां दबी सी है/7/
वक्त से छिपा लम्हें पोटली में रख्खे है
हर ही लम्हों में ही दुश्वारियां दबी सी है/8/
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