Tuesday, 15 September 2020

असहमत भी होकर हैं सहमत करें क्या

असहमत  भी  होकर हैं सहमत करें क्या
किसी  से  किसी  की शिकायत करें क्या

तेरे  दर्द  की   और   खिदमत   करें  क्या
न होती  अब हमसे  हिफाजत   करें क्या

तुझे  दिल   दुखाने  की   आदत  पड़ी है
तेरी  हरकतों  की   मजम्मत   करे   क्या

तवज्जो  नही  अब  वो   देते  हैं   हमको
ये फितरत है उनकी तो तोहमत करें क्या

अब  उनसे   कोई  भी   तवक्को  नही है
बड़े  बद मिजाजी  है   चाहत  करें  क्या

परेशां   तो   फिलहाल    हर   आदमी है
कोई कुछ भी कहने की जहमत करे क्या

शिकस्ता  हर  इक  मन  नजर आ रहा है 
मुसीबत    बड़ी  है   जहानत   करे  क्या

हर इक    शख़्स    टूटा  हुआ है  सरापा
कहाँ  तक   सुधारे    मरम्मत   करे  क्या

दिखाई   न    दे     गर  बुलंदी से  धरती
बताओ  भला   ऐसी  शोहरत  करे क्या

है   मुद्दत   से   खाली   पड़ा मेरा दामन
किसी से भी चाहत की  शिद्दत करें क्या

गर इंसा से  इंसा के  दिल तक  न पहुंचे
कोई  भी  भला  वो  मुहब्बत  करे  क्या

मुंडेरो  पे   रख्खा   दिया   फड़फड़ाया
चली  फिर  हवाएं   है आदत  करें क्या

महकने  लगी  खुश्बुओं से  सहर आज
खयालों में  उनकी  न सोहबत करें क्या

है  साहिल  पे  डूबी   सभी  कश्तियाँ है
वो  गिर्दाब  की  अब मलामत करें क्या

है  चिपके हुए  खिड़कियों पे ही  मंजर
यूँ   बेचारगी   है   नजारत   करें   क्या

गुजर  जाएगा   वक्त  ये  भी   यकीनन
अब इतने ही खातिर यूँ मन्नत करे क्या

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