2122 1122 1122 22
अपनी ही साख से बिछडा हुआ पत्ता हूँ मै
दिल जरा पास तो आ खूब ही तन्हा हूँ मै
रोज ही ख्वाब को बेचा है जरुरत के लिए
वक्त से जूझता बेबस सा वो लम्हा हूँ मै
अपने मतलब की सभी बांट लेते आपस में
घर पे आता है जो अखबार का पन्ना हूँ मै
कल जो बुनियाद था घर का उसे भूले है सभी
राएगा फालतू सा अब कोई रिश्ता हूँ मै
शह्र में सबने तगाफूल है किया जिसको सदा
वो सियासत का उछाला गया मुद्दा हूँ मै
जैसे पैबंद लगा हो कोई मंहगा कपड़ा
यूँ समझता हूँ मै खुद को कोई धोखा हूँ मै
जिंदगी खुब ही शिद्दत से तपी है अपनी
कश्मकश मे ही जरा फिर भी तो उलझा हूँ मै
चुभती जह्न में है कहकहो की आवाजें
दायरों में ही बंधी सोच मे फिरता हूँ मै
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