2122 1122 1212 22
कितने अरमान हुए दफ्न रोज सीने में
यार मुश्किल है बहुत जिंदा रहके जीने में
यूँ उसूलों के जनाजे निकलते हैं हर दिन
खुश्बू आती नही गैरत की अब पसीने में
देखा साहिल पे खड़े हो के हमने तुफां को
हम न डूबे कभी मौजों के इस सफीने में
खैरियत है यूँ तो सब मुल्क में मेरे साहब
लुत्फ़ आता है सियादत को खून पीने मे
भुख से कैसे हो समझौता बेबसी का मियां
दर्द सीने का झलकता है आबबीने में
देख फेहरिस्त तकाजों की सोचता है मन
पहली तारीख क्यूँ है आती हर महीने में
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