Tuesday, 15 September 2020

लोग ईश्वर के नही धर्म के चाकर निकले

2122 1122 1122 22
लोग   ईश्वर   के नही  धर्म  के   चाकर  निकले 
जिसको  समझे  थे  बहुमूल्य वो पत्थर निकले/1/

अब तो रंगों के भी खुश्बू के भी तय है मजहब
आदमी माथे पे अब आदमी लिख कर निकले/2/

पाक  दामन  कहाँ  किरदार  मिले  अब  कोई 
इन  जुबां  वालों  से तो  बेजुबां बेहतर निकले/3/

फिर   तमन्नाएं   बहुत   रोयी हैं   मजबूरी  पर
फिर  से  त्योहार  सहमते  हुए डर डर निकले/4/

आदमीयत   भी    पशेमान   हुई   है   फिर से
रखके पहलू में ही कुछ यार जो खंजर निकले/5/

बस  यही  सोच   बना  देती  है   मुझको गूंगा
मेरी आवाज़ से  अब कौन सा  महशर निकले/6/

घर से निकलो तो जरूरत को छिपाके निकलो
उंगलियों  पर  ही  नचाने  तुम्हें  रहबर निकले /7/

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