Tuesday, 15 September 2020

तेरी पनाह में मेरे ये जिस्मों जान रहे

1212 1122 1212 22 
तेरी   पनाह  में   मेरे   ये  जिस्मों  जान  रहे
न  हो  जमीन   या   चाहे  न  आसमान  रहे

न  इल्तिजा  न  गुजारिश  है  कोई और मेरी
बस  एक  तू  ही  खयालों में शब बिहान रहे

जुदा  न  होना  कभी   चाहे  जो  सजा देना
सफर  के  वक्त  तू है  बस  ये इत्मीनान रहे

तू   मेरे    पास    रहे    इसलिए    जरूरी है 
तमाम   उम्र  ही    चलता  ये  इम्तिहान  रहे

कुछ और बात भले हो न हो किसी से कोई
मेरी  जुबां  पे   तेरा   हर  घड़ी  बखान  रहे

हर  एक   कतरा   तेरा  नाम ही पुकारे बस 
अगरचे    जिस्म    सरापा    लहूलुहान  रहे

No comments:

Post a Comment