212 1212 1212 1212
खार खार हर तरफ है क्या करे गुलाब का
चल रहा है दौर नफरतों का और इताब का
मुश्किलों के दौर चल रही सियासतें यहाँ
वक्त ये नही है कोई गुजरे अहतिसाब का
क्या मिला है बोलिए तो किसको दिल खरास से
मन खराब ही है हासिली दिले खराब का
मिल के करना होगा सामना वबा की मार का
तब ही मिट सकेगा मुल्क से वजूद अजाब का
क्या हुआ बदल गया जो वक्त के हिसाब वो
खुल के आखिर आ गया जो मन में था जनाब का
फिर रहे हैं ओढ़ कर नकाब लोग चेहरे पर
मोल बढ़ गया बहुत है आजकल नकाब का
शहर में है अजनबी से अपने भी कुछ आशना
क्या मगर ही फायदा है उनके दस्तियाब का
मानते तो है मगर मानते भी कुछ नही
क्या भला है तुक कहो ऐसे इंतिखाब का
राह ताकते गुजर गयी उमर निगाह की
और अब न होगा इंतजार माहताब का
ख्वाहिशें सुलग सुलग के खाक हो रही यहां
पर गुरूर है कि कम न होता है जनाब का
है जहां जरूरतें वही कभी उगा नही
काम गर न आए करना क्या है आफताब का
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