212 212 212 212
शहर में शोर के कारवाँ रह गये
दब गयी सिसकियाँ कहकहाँ रह गये
चांद भी खो गया तारे भी खो गये
जीस्त में तीरगी के निशाँ रह गये
दिल ने देखे थे कल ख्वाब कुछ आपके
सुब्ह होते ही फिर बस धुआँ रह गये
आये हकीकत में वो हमने देखा नही
दीद की चाह में हम नवांँ रह गये
रंज है बस यही उनकी नजरों में अब
जो थे बेमोल अब वो गिराँ रह गये
है रकीब उनको सारे अजीज आज भी
हम वफा करके भी बस फुगाँ रह गये
अपने दिल की किताबें रही कोरी ही
कुछ रहा बस तो खुश्क से फिजाँ रह गये
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