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फिरदौस की राहों में शरर देख रहा हूँ
शैतानी गुनाहों का कहर देख रहा हूँ /१/
खैरात भी अब मिलने लगे देख के चेहरा
आवाक मैं आबिद का हुनर देख रहा हूँ/२/
रहती है जहाँ खुश्बू ही बस वो हैं लुटाती
मैं बेटियों की ऊंची डगर देख रहा हूँ/३/
परवाह नही जान की बस पैसे कमाने
यूँ उलझे हुए सारे बशर देख रहा हूँ/४/
इक ओर लदी रेशमी इक ओर से नंगी
दुनिया के मै ये दोहरे मिरर देख रहा हूँ/५/
लंबी है ये फेहरिस्त बहुत शिकवे गिलों की
मैं मौन की आहों का असर देख रहा हूँ/६/
पर लगते परिंदे तो चले अपने सफर में
खालिक की छलकती सी नजर देख रहा हूँ/७/
परछाई तलक छोड़ चली देख अंधेरा
बुनियाद के हिलने का कहर देख रहा हूँ/८/
मुंह मोड़ने के वास्ते सब इतना तकल्लुफ़
वाजिब से बहाने की डगर देख रहा हूँ/९/
तस्वीर से करने लगे हैं बातें मियां अब
खामोश हैं लब सारे जिधर देख रहा हूँ/१०/
बस अपने सिवा सबको समझती है ये मुर्दा
दुनिया का मै ये जोशे हुनर देख रहा हूँ/११/
मुद्दत से भरम पाले हुए जी रहा था मैं
मुझको नही था देखना पर देख रहा हूँ/१२/
फिरदौस - जन्नत
शरर - अंगारे
इबलीस - शैतान
खैरात - भीख
आबिद - इबादत करने वाले
मिरर - आइना
खालिक - निर्माण कर्ता
तकल्लुफ़ - औपचारिकता शिष्टाचार
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