2122 1212 22
गम की बस्ती के हर मकांँ तन्हा
इश्क में जख्म के निशांँ तन्हा
गुफ्तगू किस तरह से हो तुझसे
अब तो मिलती है हर जुबांँ तन्हा
तेरे आने की हो खबर कैसे
तेरे दर तेरा आशियाँ तन्हा
जिक्र करता नहीं कोई भी अब
तेरे हर यार मेहरबांँ तन्हा
तेरे जाने के बाद क्या ही रहा
तेरे निस्बत है दास्ताँ तन्हा
नेमते रुख बदल के लौट गई
दिखता हर आदमी यहाँ तन्हा
इश्क़ में खुद को लोग भुले है
यूँ न है दिल जिगर ये जाँ तन्हा
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