2122 1212 22
सुब्ह आई जरा जरा करके
रात गुजरी है थरथरा करके/1/
धूप लरजाई हुई दिखती है
चांद पिघला है तब्सिरा करके/2/
कुछ न हासिल हुआ सुकून हमें
हमने देखा है इल्तिजा करके/3/
हर घड़ी ही जहां की फिक्र रही
तुझको देखा भी डर-डरा के/4/
अब रवायत ही चल पड़ी है नयी
दर्द पाओगे बस वफा करके/5/
चांद के पार भी अंधेरा है
देख लो पर्दा तुम हटा करके/6/
दर्द देती है आस ही अक्सर
हमने देखा है तजरबा करके/7/
खैर ख्वाही न पूछती है कभी
खूब पछताए हम तो आ करके/8/
खुद नदारद है जिंदगी ही कहाँ
हमको दावत में यूँ बुला करके/9/
दरमियाँ ऐसे फासला करके
मत मिलो दिल जुदा जुदा करके/10/
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