Monday, 28 December 2020

सुब्ह आयी जरा जरा करके

2122 1212 22
सुब्ह   आई   जरा   जरा    करके
रात   गुजरी   है    थरथरा  करके/1/

धूप   लरजाई    हुई    दिखती  है
चांद  पिघला  है   तब्सिरा  करके/2/

कुछ  न हासिल  हुआ सुकून हमें 
हमने  देखा  है   इल्तिजा   करके/3/

हर  घड़ी ही  जहां की फिक्र रही 
तुझको   देखा   भी   डर-डरा के/4/

अब रवायत ही चल पड़ी है नयी 
दर्द  पाओगे   बस   वफा  करके/5/

चांद   के  पार    भी     अंधेरा है
देख  लो   पर्दा  तुम  हटा  करके/6/

दर्द  देती  है   आस  ही  अक्सर
हमने  देखा  है   तजरबा  करके/7/

खैर  ख्वाही   न  पूछती है कभी
खूब  पछताए हम तो आ करके/8/

खुद  नदारद है जिंदगी ही कहाँ
हमको  दावत  में यूँ बुला करके/9/

दरमियाँ   ऐसे  फासला  करके
मत मिलो दिल जुदा जुदा करके/10/

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