Monday, 28 December 2020

अंधेरों की हस्ती मिटाने की खातिर

122 122 122 122 
अंधेरो की हस्ती मिटाने की खातिर 
मैं सूरज कभी अपने घर चाहता हूँ

कभी देख ले आसमाँ मेरे बच्चे 
उजाले जरा मैं इधर  चाहता हूँ

हूँ वाकिफ बहुत ऐ खुशी तेरे कद से
तुझे करना हासिल मगर चाहता हूँ

यूँ सजदे में हर पल तेरे हम रहे हैं 
ऐ मालिक अब उसका असर चाहता हूँ

तमाम उम्र गुजरी है बस उलझनों में 
सुकुनो भरा अब सफर चाहता हूँ

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