Saturday, 2 January 2021

रंज बदला न ये हर दिन का तमाशा बदला

2122 1122 1122 22
रंज बदला न ये हर दिन का तमाशा बदला
न कोई जद्दोजहद कोई तकाजा बदला

आज भी सोच वही दायरो में सिमटी है
फिर ये तारीख सिवा कहिये भला क्या बदला

हर ही चेहरे पे दिखा खौफ़ दिखी बेचैनी 
पर किसी के भी न जीने का तरीका बदला

उम्र गुजरी है फकत ख्वाब की ताबीर में ही
चाह मंजिल की रही तौर न अपना बदला

पन्ना पन्ना है मेरी जिन्दगी का इसका गवाह
नाम मजबूरियों का दे के न रिश्ता बदला

वक़्त ने खूब ही शिद्दत से पढ़ा है हमको
कुछ मुरव्वत न कोई हमसे किया या बदला

लत के जैसी है उदासी भी जिसे लग जाए
पर कभी उसने कोई तौर न अपना बदला

हर कोई खुद को समझता है समझदार यहाँ
दौर बदला है पर उनका न भरोसा बदला

No comments:

Post a Comment