तेरी गली में मकां आलिशान बाकी है
मेरी बस्ती में टूटे से मकान बाकी है
भूखे भूखे से बशर है अभी वहीं पर ही
तुम्हारे सामने ढेरों पकवान बाकी है
चखा नही जो कभी भूख तुम क्या जानो
भरा भरा सा ये मन है जबान बाकी है
कभी खुशी तो कभी की ये जिंदगी ही है
मजा तु भी ले ले काफी उडान बाकी है
तेरी गलियों में आते हैं मसखरे सारे
हमारे गांव में हंसी का जहान बाकी है
किताब कौन सी पढाई तुमको गई जो
जहीन होने के ना ही निशान बाकी है
कसर कहां रह गई जो तवील है इतनी
मुसीबतों की उमर इम्तिहान बाकी है
खरीद के रख लिया है खुशियों को तो
गमों के आज भी थोड़े दुकान बाकी है
मखौल बन कर रह गई है जिंदगी लोगों
लेकिन अब तक इसमें मुस्कान बाकी है
अभी बचा है लोगों के आंख में पानी
यहीं कहीं पे मेरा हिंदूस्तान बाकी है
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