खामखां है दर ब दर का आदमी
ना ही घर का ना सफर का आदमी
इस कदर उलझा हुआ है रिश्तों में
वो है अपने से जुदा सा आदमी
जिंदगी में जिंदगी को ढुंढता
जिंदगी भर उलझा सा आदमी
वो जरुरत की मुकम्मल धूर है
घर में सबका हाथ खर्चा आदमी
ख्वाहिशों को दफ्न कर जीता है वो
मुस्कुराहट में छिपा सा आदमी
हसरतों की भीड़ में सहमा खड़ा
वो जरूरतों में उलझा आदमी
बेचता है रोज खुद को हाट में
टूकड़ो में वो बंटा सा आदमी
आंच पर हस्ती हैं उसकी हर घड़ी
जलती अंगीठी में बैठा आदमी
चीखता है वो कोई सुनता नही
अंधे बहरो के शह्र का आदमी
पीसता है खुद को पुरी उम्र वो
भींच मुट्ठी का पसीना आदमी
घोंसलों से आशियाने का सफर
जी के मरता मर के जीता आदमी
दैर की हो बात या की हो हरम
सबमें आधा आधा उलझा आदमी
खौफ उसको नियति का भी नही
बन गया है खुद खुदा सा आदमी
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