Saturday, 22 September 2018

हादसों के दरमियां जिंदा हूँ मैं

हादसों के दरमियां जिंदा हूँ मैं
लोकतंत्र का निहां मुद्दा हूँ मैं

मै समंदर पी गया हूँ देख लो
जाने कितने वक्त से प्यासा हूँ मैं

चुभते हैं तीर से अल्फाज़ अब
खामुशी से देर तक उलझा हूँ मैं

सिसकियाँ है दबी सीने में पर
सामने तो सबके ही हंसता हूँ मैं

बेरिदा से ख्वाब ओढ़े फिरता
है अयां सब साथ बे रिया हूँ मैं

फितनों का हूं मुकम्मल मुब्तिला
सर गिरां सा है शहर हादसा हूँ मैं

घर के रोटी की जुगत के वास्ते
साथ सूरज के सफर करता हूँ मै

सुर्खियां बनने न पायी जिंदगी
फब्तियां ही फब्तियां ढोया हूँ मैं

रात भर जो रात को ढोता रहा
चांद के पीछे का वो काला हूँ मैं

बांटता जो रोशनी सबको मगर
तिरगी में रह के वो दीया हूँ मैं

बे नवा का ख्वाब हूँ मैं दिल-कुशा
मुफलिसी का गिजा लुक़मा हूँ मैं

निहां - छिपा,/बेरिदा - बेलिबास /बे रिया - साफ दिल/फितनों - फसादों /मुब्तिला - गिरफ्त में /सर गिरां - नाखुश /बे नवा - दरिद्र दीन/दिल कुशा - मनोहर /गिजा - खुराक /लुक़मा - निवाला

No comments:

Post a Comment