हादसों के दरमियां जिंदा हूँ मैं
लोकतंत्र का निहां मुद्दा हूँ मैं
मै समंदर पी गया हूँ देख लो
जाने कितने वक्त से प्यासा हूँ मैं
चुभते हैं तीर से अल्फाज़ अब
खामुशी से देर तक उलझा हूँ मैं
सिसकियाँ है दबी सीने में पर
सामने तो सबके ही हंसता हूँ मैं
बेरिदा से ख्वाब ओढ़े फिरता
है अयां सब साथ बे रिया हूँ मैं
फितनों का हूं मुकम्मल मुब्तिला
सर गिरां सा है शहर हादसा हूँ मैं
घर के रोटी की जुगत के वास्ते
साथ सूरज के सफर करता हूँ मै
सुर्खियां बनने न पायी जिंदगी
फब्तियां ही फब्तियां ढोया हूँ मैं
रात भर जो रात को ढोता रहा
चांद के पीछे का वो काला हूँ मैं
बांटता जो रोशनी सबको मगर
तिरगी में रह के वो दीया हूँ मैं
बे नवा का ख्वाब हूँ मैं दिल-कुशा
मुफलिसी का गिजा लुक़मा हूँ मैं
निहां - छिपा,/बेरिदा - बेलिबास /बे रिया - साफ दिल/फितनों - फसादों /मुब्तिला - गिरफ्त में /सर गिरां - नाखुश /बे नवा - दरिद्र दीन/दिल कुशा - मनोहर /गिजा - खुराक /लुक़मा - निवाला
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