जईफी को छिपाया जा रहा है
खिजाबों सा लगाया जा रहा है
शकल में पोत कर चूना वगैरह
जवां खुद को बताया जा रहा है
बुजूर्गियत फकत अहसास ही है
जहाँ सर पे उठाया जा रहा है
महज चंद लम्हे की ये जिंदगी है
सिकन माथे पे लाया जा रहा है
अजब दस्तूर है ये दुनिया का
जतन कल का बनाया जा रहा है
खबर पल की नही है कोई पर भी
जहन में ख्वाब लाया जा रहा है
जुबां पर रख कर जहर की पोटली को
हमी को आजमाया जा रहा है
जतन किए है बड़े हमनें तभी तो
हमे बकरा बनाया जा रहा है
शहर भुखा है तेरे दीद का ही
भला क्यूँ यूं सताया जा रहा है
रवायतें निभाया जा रहा है
बेजा ही मुस्कुराया जा रहा है
तनाबें बांध लिए जिंदगी के
अजल की ओर जाया जा रहा है
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