Wednesday, 12 February 2020

बसंत आते ही मौसम की मार गुजरेगी

बसंत  आते  ही   मौसम  की  मार  गुजरेगी
खिलेंगे   मौर  भी   महकी   बयार  गुजरेगी

शजर में  फिर से  नये फूल पल्लवित   होंगे
यकीं  है  अब कि  इधर  से  बहार  गुजरेगी

जगी है  आस   नयी   दरमियाँ   उदासी  के
चलो  कभी  तो  कहीं  हंस  के यार गुजरेगी

फिर  एक  बार    पसारेंगी    पांव    उम्मीदें
बहुत  करीब  से   हसरत   हजार   गुजरेगी

नया है दिन  है नयी सुब्ह  कुछ तो बदलेगा
या अब कि बार भी  खुशियां उधार गुजरेगी

अजब नशा है सियासत का आज लोगों पर
हर एक दिन   यूँ ही  फितने सवार  गुजरेगी

समझ  ये पायेगी  जमहूर  कब सही क्या है
ये  कब तलक  यूँ ही  रहबर खुमार गुजरेगी

खयाल  ख्वाब में  तस्वीर  इक  बनी है  जो
बची  ये जिन्दगी  उस को  निखार  गुजरेगी

हसीन  सपने  सजाए थे  दिल  के  कोने में
जहन  जिगर पे  वही  अब  बेदार  गुजरेगी

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