बसंत आते ही मौसम की मार गुजरेगी
खिलेंगे मौर भी महकी बयार गुजरेगी
शजर में फिर से नये फूल पल्लवित होंगे
यकीं है अब कि इधर से बहार गुजरेगी
जगी है आस नयी दरमियाँ उदासी के
चलो कभी तो कहीं हंस के यार गुजरेगी
फिर एक बार पसारेंगी पांव उम्मीदें
बहुत करीब से हसरत हजार गुजरेगी
नया है दिन है नयी सुब्ह कुछ तो बदलेगा
या अब कि बार भी खुशियां उधार गुजरेगी
अजब नशा है सियासत का आज लोगों पर
हर एक दिन यूँ ही फितने सवार गुजरेगी
समझ ये पायेगी जमहूर कब सही क्या है
ये कब तलक यूँ ही रहबर खुमार गुजरेगी
खयाल ख्वाब में तस्वीर इक बनी है जो
बची ये जिन्दगी उस को निखार गुजरेगी
हसीन सपने सजाए थे दिल के कोने में
जहन जिगर पे वही अब बेदार गुजरेगी
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