है अपनी हरिक मौज उधारी सुबह से
जरूरत है ख्वाहिश पे तारी सुबह से
क्यूँ आंखों में है अश्क तारी सुबह से
हुआ जा रहा दिल भी भारी सुबह से
नया कोई मेहमान आने को है क्या
गमो का तो है आना जारी सुबह से
परिशान हर शख़्स दिखता यहां है
तबस्सुम है सबकी उधारी सुबह से
शिकायत तो है खूब सारी यूँ तुमसे
मगर यादें तेरी है भारी सुबह से
हुई मुद्दतें तुझको देखा नही है
खयालों में यूँ है तू तारी सुबह से
तमाशा नया रोज दहलीज़ पर है
चला आ रहा है मदारी सुबह से
पशेमां कदम दर कदम जिंदगी है
कुछ ऐसी चली है बिमारी सुबह से
हमारी जो होकर नही है हमारी
वही जीस्त हमने गुजारी सुबह से
लगाया है तोहमत पे तोहमत है जिसने
वही एक सुरत निहारी सुबह से
बिठाया सिर आंखों पे जिस शख़्स को है
उसी ने है इज्जत उतारी सुबह से
खयालो में गुजरी फकत रात उनके
जहन में है फिर बेकरारी सुबह से
बहुत बेलगाम हसरतों का है घोड़ा
हर इक शख़्स करता सवारी सुबह से
किये जो हमल में है कल भ्रूण हत्या
वो ढूंढे है कन्या कुवांरी सुबह से
ये दैरो हरम का भरोसा करें क्या
जो खुद है भरोसे पुजारी सुबह से
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