Wednesday, 5 February 2020

है अपनी हरिक मौज उधारी सुबह से

है  अपनी  हरिक मौज उधारी  सुबह   से
जरूरत  है  ख्वाहिश  पे  तारी  सुबह  से

क्यूँ  आंखों  में  है  अश्क  तारी  सुबह से
हुआ  जा  रहा  दिल  भी  भारी  सुबह से

नया   कोई   मेहमान  आने  को  है  क्या
गमो   का   तो  है  आना  जारी  सुबह से

परिशान   हर   शख़्स   दिखता   यहां  है
तबस्सुम  है   सबकी    उधारी   सुबह  से

शिकायत  तो  है   खूब   सारी  यूँ   तुमसे 
मगर  यादें   तेरी    है  भारी     सुबह   से

हुई    मुद्दतें     तुझको     देखा    नही  है
खयालों  में   यूँ  है   तू   तारी    सुबह  से

तमाशा   नया    रोज    दहलीज़   पर  है
चला   आ   रहा   है    मदारी    सुबह  से

पशेमां   कदम   दर   कदम    जिंदगी  है
कुछ  ऐसी   चली  है   बिमारी   सुबह  से

हमारी   जो    होकर    नही   है    हमारी
वही   जीस्त   हमने    गुजारी   सुबह  से

लगाया है  तोहमत पे तोहमत  है  जिसने
वही   एक    सुरत    निहारी     सुबह  से

बिठाया सिर आंखों पे जिस शख़्स को है
उसी  ने   है   इज्जत   उतारी   सुबह  से

खयालो  में   गुजरी   फकत  रात  उनके
जहन  में   है   फिर   बेकरारी   सुबह  से

बहुत   बेलगाम  हसरतों   का   है   घोड़ा
हर इक  शख़्स   करता  सवारी  सुबह से

किये  जो   हमल में है   कल  भ्रूण हत्या
वो   ढूंढे   है    कन्या  कुवांरी   सुबह  से 

ये   दैरो हरम   का   भरोसा   करें    क्या
जो  खुद  है   भरोसे   पुजारी   सुबह  से

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