रोज के हादसों का दिल पे भी असर आता है
आदमी गाहे-बगाहे यूँ ही डर जाता है
चोट करती है जो गहराई तलक शिद्दत से
उम्र भर दाग भी चेहरे पे नजर आता है
शिद्दतों से जो तराशा गया पत्थर भी कभी
पारसाई सा वो किरदार निखर आता है
यूँ न बरपाओ कहर इंतेहां है जुल्मत की
खौफ मासूम की आंखों में उतर आता है
हसरतें रोज ही दम तोड़ती है चौखट पर
जेब खाली लिए जब बाप वो घर आता है
झूठ की भीड़ में दम तोड़ती सच की सांसे
शोर ही शोर सभी ओर जो भर आता है
बेच आते है सभी शौक जरूरत के लिए
शाम होते ही थका जिस्म इधर आता है
वक्त के साथ बदलना नही आता है हमें
गैर को अपना बनाने का हुनर आता है
दुश्मनों को भी करे माफ जो धोखे खाकर
आते आते ही किसी पर ये असर आता है
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