Tuesday, 11 February 2020

नफरत से हर किसी का ही नुकसान ही तो है

नफरत से हर किसी का ही नुकसान ही तो है
रखकर   गुबार   जिंदगी   हलकान  ही  तो है

बिखरी थी  कल  फिजाओं में रंगत बहार की
वो  बस्तियां  भी   खौफ  से   वीरान ही तो है

हर शख़्स  जिम्मेदार  है  इस  हाल  के  लिए 
सहमा   डरा  जो   वक्त   है दौरान  ही  तो है

क्यूँ  जात  और  जमात  में  बंटता  है आदमी
पहले तो  हर एक  शख्स भी  इंसान ही तो है

जद्दोजहद  यूँ  जीने की  खातिर  ही चल रही
पर  हर बशर  ही  वक्त से  अनजान ही तो है

रहने  को  कौन  आया  है  दुनिया  में  दोस्तों
दो चार  दिन  का  हर  कोई मेहमान ही तो है

मुश्किल बड़ी है जिसके समझ में न आयी है
समझा है  जिसने  जिंदगी  आसान  ही तो है

आने  दे  लब  पे  आती  है  तो  रोक  न  इसे
महशर  नही  है  कोई  ये  मुस्कान  ही  तो  है

कमबख्त अब तो बख्श दे अहसान कर जरा
दिल  तुझपे  है  फिदा  बड़ा  नादान ही तो है

ऐसे  गिरा  न   आंखों  से   बारे गिराँ   है   ये 
आंसू   ये  तेरे   दर्द  के   दरबान   ही  तो  है

है  वो  नया नया  अभी  उसको  खबर  नही
उल्फत  की राह  से अभी अनजान ही तो है

रह रह   के   है   मचलती   तमन्नाएं  सीने में
कब तक  इन्हें  दबाएँ  ये  अरमान  ही तो है

गैरत   जमीर   से   जो   रहे   हैं   यतीम  से
जिंदा  है  जिस्म  से  मगर  बेजान  ही तो है

कितना  मजा है   दर्द है  कैसे  मिजाज  का
क्या  जाने  वो  भला  कि ये तूफान ही तो है

खिदमत कभी तो कर ले तू मां बाप की जरा
धरती  पे   जीते जागते   भगवान  ही  तो  है

क्यूँ  हड़बड़ाते  देख  के  मफ़ऊल फ़ाइलातु
शेरो सुखन   के  वास्ते   अरकान   ही  तो है

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