नफरत से हर किसी का ही नुकसान ही तो है
रखकर गुबार जिंदगी हलकान ही तो है
बिखरी थी कल फिजाओं में रंगत बहार की
वो बस्तियां भी खौफ से वीरान ही तो है
हर शख़्स जिम्मेदार है इस हाल के लिए
सहमा डरा जो वक्त है दौरान ही तो है
क्यूँ जात और जमात में बंटता है आदमी
पहले तो हर एक शख्स भी इंसान ही तो है
जद्दोजहद यूँ जीने की खातिर ही चल रही
पर हर बशर ही वक्त से अनजान ही तो है
रहने को कौन आया है दुनिया में दोस्तों
दो चार दिन का हर कोई मेहमान ही तो है
मुश्किल बड़ी है जिसके समझ में न आयी है
समझा है जिसने जिंदगी आसान ही तो है
आने दे लब पे आती है तो रोक न इसे
महशर नही है कोई ये मुस्कान ही तो है
कमबख्त अब तो बख्श दे अहसान कर जरा
दिल तुझपे है फिदा बड़ा नादान ही तो है
ऐसे गिरा न आंखों से बारे गिराँ है ये
आंसू ये तेरे दर्द के दरबान ही तो है
है वो नया नया अभी उसको खबर नही
उल्फत की राह से अभी अनजान ही तो है
रह रह के है मचलती तमन्नाएं सीने में
कब तक इन्हें दबाएँ ये अरमान ही तो है
गैरत जमीर से जो रहे हैं यतीम से
जिंदा है जिस्म से मगर बेजान ही तो है
कितना मजा है दर्द है कैसे मिजाज का
क्या जाने वो भला कि ये तूफान ही तो है
खिदमत कभी तो कर ले तू मां बाप की जरा
धरती पे जीते जागते भगवान ही तो है
क्यूँ हड़बड़ाते देख के मफ़ऊल फ़ाइलातु
शेरो सुखन के वास्ते अरकान ही तो है
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