नजदीकियों हालात का पता चलता है
मुश्किलों में औकात का पता चलता है
इक उम्र गुजर जाये तब कहीं जाकर ही
गुजरे हुए लमहात का पता चलता है
नीयत चेहरों से बयां कहां होती हैं
मुंह खुले तो जात का पता चलता है
कब उजालों ने जाना हाल अंधेरों का
रातों को ही रात का पता चलता है
दीवारें जो घर की दरकने लगती है
रिश्तों की सौगात का पता चलता है
भर आती है बैठे कभी यूँ ही आंखे ये
फुर्सत में ही जज्बात का पता चलता है
साहिल बैठे लोग गहराई क्या जाने
मंझधार में आफात का पता चलता है
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