2122 2122 2122 212
राम की धरती पे रावण की डमी स्वीकार की
क्यूँ भला हमने सियासी काहिली स्वीकार की /1/
चल रही मजहब की ठेकेदारियाँ जिनकी उन्हें
पूछिए क्यूँ राम पर बेहूदगी स्वीकार की /2/
सर कलम मत कीजिए पर दीजिए कुछ तो सजा
धृष्टता आराध्य पर कैसे कोई स्वीकार की /3/
सोच जिनकी शह्र की गलियों के जैसी तंग है
हमने उनकी रहनुमाई क्यूँ कभी स्वीकार की /4/
खो गईं सद्भावनाएँ कुर्सियों के खेल में
रहबरों ने भी बस अपनी बेहतरी स्वीकार की /5/
राम हैं आराध्य जन मानस के हैं अति पुज्यनीय
कैसे हमने राम पर छींटा कशी स्वीकार की /6/
लापता है जिंदगी कुछ उलझनों की भीड़ में
अब इसी हालात में सबने खुशी स्वीकार की /7/
मुस्कुराने की वजह मिलती नही है सहल ही
बेबसी में मुफलिसी ने मसखरी स्वीकार की /8/
भीड़ गंगा में लगी रहती नही यूँ ही हुजूर
सबने अपने पाप कर्मो की बही स्वीकार की /9/
खुशनसीबों में स्वयं को हम समझने हैं लगे
आपने जब से हमारी दोस्ती स्वीकार की /10/
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