2122 1212 22
अख्तियारी जो दर्द पर कर ले
जिंदगी को तो यूँ बसर कर ले
आदमी दिल के हाथ हारा है
वरना वो आसमां पे घर कर ले
डुबते वक्त जर्द था सूरज
क्या यकीं उसके मौत पर कर लें
शम्स ने बांध ली तनाबें हैं
चांद के साथ अब गुजर कर लें
बेबसी मुंह छिपाने है बेबस
तजकिरा इसपे भी बशर कर ले
हाथ सजदे में उठ गए खुद ही
कुछ तो इस बात की कदर कर ले
दाग किरदार से बचा कर रख
शख्सियत अपनी मोतबर कर ले
चाहे दैरो हरम तू कर रोशन
बस जरा रोशनी इधर कर ले
खेल जज्बात को समझते वो
क्या यकीं उनकी बात पर कर ले
वो बुरा है मगर करीबी है
क्या सुलह अब ये सोचकर कर ले
है बदलता वो हर कदम चेहरा
हम यकीं कौन शक्ल पर कर ले
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