Monday, 22 March 2021

क्या तलब रही दिल की कुछ नही बता पाया

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क्या  तलब  रही  दिल  की  कुछ नही बता पाया
बे हिसाब    बेचैनी     बस    मैं     छटपटा  पाया/1/

जिंदगी    हुई    दर दर     बस   सुकूं   के  वास्ते
पर  मिली  नही  राहत   ना  ही  कुछ  दवा पाया/2/

कुछ  तो  धोखे  ने  मारा   कुछ  यकीं  ने मारा है
अब  कदम कदम  पर  ही   आदमी   दगा पाया/3/

क्या  वफा की  कीमत है  और कहाँ ये मिलती है
हर  किसी  से   पूछा  पर   कोई  ना   बता  पाया/4/

मैं  की  लग  गयी  जिसको  भी  हवा   जमाने में
ना  दुआ  ही  काम  आयी  ना ही कर दवा पाया/5/

कहते  लोग  नाहक  ही  है  बुरा  किसी  को  भी
आदमी   भले  हैं  सब    वक़्त  ही   बुरा   पाया/6/

सोच  ने   नजरिये  को    धुंधला   के   रक्खा है
दोष  सारा   कोहरे  पर    बे वजह   धरा   पाया/7/

ओढ़ कर   कफन   फिरते   देखें  हैं   यहां   मुर्दे
कहने  बस  को  जिंदा हैं  हर  कोई   मरा  पाया/8/

चांद   पूर्णमासी  का    सा  लगे है    वेतन  अब
एक  दिन  दिखा  पुरा   रोज  फिर   घटा  पाया/9/

बिक   रहीं हैं   भंगारो   में   पुरानी   यादें   सब
मोल  क्या   कोई  देता   ना  ही  मैं  बता  पाया/10/

दिन  पलटते  जाते  हैं   खाली  पन्नों   के  जैसे
कुछ समझ न आए क्या खोया और क्या पाया/11/

पहले   आंधियां  आयी   फिर  हुई  हैं  बरसातें
यूँ   बिछड़ने  से  पहले   दिल  भरा भरा  पाया/12/

देती है  अदाकारी  दुख  बहुत  ही  ज्यादा अब
चाह  है  दिली    गर  मैं   मुस्कुरा   जरा  पाया/13/

खामुशी  भी  अच्छी  है  यूँ  कभी कभी साहब
अच्छे अच्छे  मसलो का हल यूँ भी हुआ पाया/14/

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