221 2121 1221 212
उलझे हुए खयाल में उलझा हुआ हूँ मैं
मुद्दत से अपने आप से भी लापता हूँ मैं/1/
कैसे मै अपनी जात बताऊँ जहान को
भीतर से सुर्ख लाल हूँ बाहर हरा हूँ मैं/2/
बेशक तुम्हारे फोन की उम्मीद कुछ नही
फिर भी सहेज क्यूँ तेरे नंबर रखा हूँ मैं/3/
खोया था अब तलक तो मैं रिश्तों की भीड़ में
अब आदमी की जात परखने लगा हूँ मैं/4/
मिलता मेरे मिजाज का अब कोई भी कहाँ
उम्मीद पर न खुद की भी उतरा खरा हूँ मैं/5/
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