12122 12122
कहर है बरपा हुआ दिलों में
उदासियां पसरी है घरों में/1/
न रोशनी की उम्मीद कोई
छिपा है सूरज भी बादलों में/2/
हो चाहे कितना भी वक़्त मुश्किल
कमी नही कोई हौसलों में/3/
कभी गुजर के जरा तो देखो
इबादतों की भी बस्तियों में/4/
उठे दुआओं में हाथ हजारों
तलब सभी की थी रोटियों में/5/
सियासतों का अहम है किरदार
मेरे वतन की तबाहियों में/6/
है कुर्सियां खूब मुस्कुराती
लगे अगर आग बस्तियों में/7/
न रखते अब कोई दाना पानी
न आते पंछी ही अब छतों में/8/
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