221 2121 1221 212
बस गुफ्तगू की हमसे ही फुर्सत नहीं मिली
हर शय थी जद में इक यही दौलत नहीं मिली /1/
हर दिल अजीज का रहा दिल को मेरे गुमान
उनकी नजर में बस हमें इज्जत नहीं मिली/2/
खुशियाँ कभी मिली भी तो खैरात की तरह
अपने जो हक में आए वो नेमत नहीं मिली/3/
हमको रही खुलूशे वफ़ा की तलाश बस
रिश्तों के कारोबार में चाहत नहीं मिली/4/
कितने किये जतन कि जरा चैन अब मिले
गुजरी तमाम जिंदगी राहत नहीं मिली/5/
No comments:
Post a Comment