2122 2122 2122 212
हर कोई जिंदा यहाँ है बस तसल्ली के लिए
जी रहा है कौन कहिये अपनी मर्ज़ी के लिए/1/
गिरना उठना लड़खड़ाना फिर संभलना रोज़ ही
जंग लड़ना सबको पड़ता है तरक्की के लिए/2/
दूरियाँ कुछ मिट गईं पर फासले तो बढ़ गये
दौरे मोबाइल तरसते लोग चिट्ठी के लिए/3/
अब तो खुशियाँ भी कुछ ऐसे ही कभी घर आतीं हैं
जैसे पीहर आए बेटी पांव फेरी के लिए/4/
No comments:
Post a Comment