2122 1122 1122 22
सब्र कर रात के उस पार सहर का घर है
भोर के गर्भ में सूरज है उजाला भर है/1/
इक दिया आस का हमने भी जला रक्खा है
रात लम्बी है जरा तेल भी कुछ कमतर है/2/
इक खबर से न जियादा है कोई हस्ती तेरी
ऐ बशर बस तू सियासत के लिए नंबर है/3/
था जिन्हें हिन्द पे कल नाज कहाँ हैं वो अब
आज तस्वीर नजर आयी कितनी बदतर है/4/
कत्ल कर दो मुझे गर मसअला हल होता है
पर सवालो को न मारो यूँ ही ये बेघर है/5/
वक़्त बतलाता है अब आदमी की असलियत
पैरहन ने तो कहा झूठ यहाँ अक्सर है/6/
कर दो मंदिरों को मस्जिदों को चारागर
पारसाई न हो किस काम के ये खंडर है/7/
अब कहाँ जाए भला चोट लिये हम अपनी
पासबाँ भी तो है नासाज़ पड़ा बिस्तर है/8/
खून तो सबका है शामिल यहाँ नाकामी में
दोष इक जैसा ही सबके ही यहाँ सर पर है/9/
सहर - सुबह/बशर - आदमी /पैरहन - लिबास /
/पारसाई - धर्मात्मा /पासबाँ - रक्षक /नासाज़ - बीमार/
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