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दस्तूर पासबानी निभाने का शुक्रिया
किस्तों में रोज मरना सिखाने का शुक्रिया/1/
सिस्टम की लाश कांधो पे ढोता है आदमी
हालत जटिल इतने बनाने का शुक्रिया/2/
मरने की आरजू में जीये जा रहे हैं सब
जद्दोजहद के दौर बढ़ाने का शुक्रिया/3/
कुछ दायरों में ही ये सिमट कर के रह गयी
खुशियों को इस मकाम पे लाने का शुक्रिया/4/
महफ़िल जमें हुए भी जमाना गुजर गया
मशरूफियत को यार बनाने का शुक्रिया/5/
चेहरे के सारे दाग दिखाया वो आईना
भीतर की असलियत को छिपाने का शुक्रिया/6/
अब तक सहा है और भी सह लेंगे हादसे
मजबूत इतना हमको बनाने का शुक्रिया/7/
गैरों ने खूब साथ दिया खोल कर जिगर
अपनो के हर कदम पे बहाने का शुक्रिया/8/
पासबानी _ध्यान रखना
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