Saturday, 23 July 2022

घोर अंधेरों में फंसा अपना है जीवन आज भी

2122 2122 2122 212 
घोर  अंधेरों  में   फंसा  अपना  है   जीवन    आज भी
बस  जरा  खुशियों  की  खातिर ही हैं निर्धन आज भी /1/

जाने    कब     बस्ती    हमारे    आएंगे    सूरज  मियांँ 
चल  रही   अपनी   उजालों  से है   अनबन  आज भी/2/

आंधियों  को  भी     पसीना  आ  गया     ये  देख कर 
दरमियाँ  तूफाँ  के  इक  दीपक  है  रोशन    आज भी/3/

ख्वाहिशें  हैं  मोम सी   वो    सह  न  पाती     धूप को 
रफ़्ता रफ़्ता   बस  पिघलती   रहती    बैरन  आज भी/4/

कहकहों  में  दब  के सारी  सिसकियाँ  फिर   रह गईं 
चल रहा  है    जिंदगी  के   नाम     प्रहसन   आज भी/5/

हर  कोई    परेशान  सा    हैरान  सा    लगता   यहाँ 
हर किसी के  दिल में ही है  कुछ तो उलझन आज भी/6/

राह  तकतीं   दर दिवारें   और   छाजन    हर समय 
ढूंढता    बेसुध   तुम्हें   सारा  ये   चिलमन    आज भी/7/

सो गये  थक  कर  धुआंँ  ही  ओढ़ कर  सारे  चराग
स्वप्न  धर  आंखों  में    बैठी  रात    बिरहन  आज भी/8/

बांट  लेती   बेटियाँ  हैं      दर्द  गम     सब  बाप के
बांटते  देखा  है      बेटों  को  केवल   धन    आज भी/9/

जाने  किसको  फूंक कर   आए हैं    सब मैदान में
अच्छे खासे   फिर  रहे     बस्ती में   रावन  आज भी/10/

मुश्किलों  से  जूझने  का  था  हुनर  पापा  में खूब
पर  न  आ  पाया   मेरे    हाथों  में  वो  फन आज भी/11/

No comments:

Post a Comment