2122 2122 2122 212
घोर अंधेरों में फंसा अपना है जीवन आज भी
बस जरा खुशियों की खातिर ही हैं निर्धन आज भी /1/
जाने कब बस्ती हमारे आएंगे सूरज मियांँ
चल रही अपनी उजालों से है अनबन आज भी/2/
आंधियों को भी पसीना आ गया ये देख कर
दरमियाँ तूफाँ के इक दीपक है रोशन आज भी/3/
ख्वाहिशें हैं मोम सी वो सह न पाती धूप को
रफ़्ता रफ़्ता बस पिघलती रहती बैरन आज भी/4/
कहकहों में दब के सारी सिसकियाँ फिर रह गईं
चल रहा है जिंदगी के नाम प्रहसन आज भी/5/
हर कोई परेशान सा हैरान सा लगता यहाँ
हर किसी के दिल में ही है कुछ तो उलझन आज भी/6/
राह तकतीं दर दिवारें और छाजन हर समय
ढूंढता बेसुध तुम्हें सारा ये चिलमन आज भी/7/
सो गये थक कर धुआंँ ही ओढ़ कर सारे चराग
स्वप्न धर आंखों में बैठी रात बिरहन आज भी/8/
बांट लेती बेटियाँ हैं दर्द गम सब बाप के
बांटते देखा है बेटों को केवल धन आज भी/9/
जाने किसको फूंक कर आए हैं सब मैदान में
अच्छे खासे फिर रहे बस्ती में रावन आज भी/10/
मुश्किलों से जूझने का था हुनर पापा में खूब
पर न आ पाया मेरे हाथों में वो फन आज भी/11/
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