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बस हिंदू रह गये और मुसलमान रह गए
इंसाँ की जुस्तजू में गुलिस्तान रह गए /1/
जिन बस्तियों में कल थी हंँसी खूब जिंदगी
अब जात और जमात के पहचान रह गए /2/
रिश्तों के दरमियाँ भी यूँ छाई है बेरूखी
बस बोल चाल बंद के फरमान रह गए/3/
चौराहे देख हादसा कुछ भीड़ तो हुई
फिर जात सुन के खाली से मैदान रह गए/4/
है खुदखुशी की अर्जियाँ मुर्दों के शहर में
जिसने सुना अवाक से हैरान रह गए/5/
मौका परस्ती झूठ कपट और फरेब के
रस्ते निठल्लों के लिए आसान रह गए /6/
दैरो हरम के फेर में उलझे हम इस कदर
अम्नो जुबान भूल के हलकान रह गए /7/
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