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खुद अपने में ही खुद को तलाशेंगे किसी रोज
दुनिया ये भुलाकर के भी देखेंगे किसी रोज/1/
अल्फाज़ ने कर रक्खी बगावत है जहन में
लम्हे चुरा के वक़्त से लिक्खेंगे किसी रोज/2/
नाराज़ ये दिल क्यू्ँ न हो हर बात पे अब तेरी
फुर्सत में कभी बैठ के सोचेंगे किसी रोज/3/
उम्मीदें तमन्नाएँ ये सपने ये मरासिम
अब जान ही लेकर के ये मानेंगे किसी रोज/4/
जो गुजरी है हमपे कहीं शायद ही हो गुजरी
सब हमको कहानी में सुनाएंगे किसी रोज/5/
अब हो गये बच्चे भी गरीबी से हैं वाकिफ़
भूख अपनी तसल्ली से मिटाएंगे किसी रोज/6/
है जानती ये मुफलिसी कुछ कम है बिछौना
पलकों पे ही मेहमां को बिठाएंगे किसी रोज/7/
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