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हर शख्स ही यहाँ पे सियासत से तंग है
फिरका परस्ती झूठ से नफरत से तंग है /1/
गठजोड़ जब से जुल्म का खादी से हो गया
अखबार सुर्खियों की इबारत से तंग है /2/
महंगे हुए हैं आजकल बाजार इस कदर
पब्लिक बदलते दाम से कीमत से तंग है /3/
इंसानियत की कौम नही है ये शुक्र है
वरना तो मुल्क सिजदे इबादत से तंग है/4/
फिल्में भी अब तो हिन्दू मुसलमान हो गयी
आम आदमी ये मजहबी फितरत से तंग है/5/
जिनके लिए है जंग उन्ही को पता नही
दैरो हरम भी आपसी हुज्जत से तंग है/6/
खेमों में बंट चुकी है हर इक सोच आज की
हर जिंदगी नजरिये से नीयत से तंग है/7/
नादान दिल फरेब में आ जाता है सहल
हर शख्स दिल की चाह से हसरत से तंग है/8/
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