212 212 212 212
हर कदम गिर के खुद ही संभलती रही
झाड़ के गर्द फिर मुस्कुराती रही/1/
सिलसिला अनवरत हाय चलता रहा
जिंदगी हर समय ख्वाब बुनती रही /2/
इक सिरा वक़्त की गांठ का जो खुला
हाथ से रफ़्ता रफ़्ता फिसलती रही/3/
कागजों में तो हम भी अमीर हैं मगर
जीस्त फाको में ही बस गुजरती रही/4/
सारे बर्तन रसोई में भूखे रहे
जिंदगी बस कहानी पकाती रही/5/
ख्वाहिशें रोज़ करती हैं दंगे यहाँ
रोज़ रिश्तों से अनबन सी चलती रही/6/
चांद कहता रहा चांद हूँ चांद मैं
भूखी थी रात व्याकुल निगलती रही/7/
कैसे गुजरी न पूछो तुम्हारे बिना
मशवरों की दवा रोज़ मिलती रही/8/
शोख रस्मों रिवाजों की बस्ती में माँ
दरमियाँ भाई भाई के पिसती रही/9/
नौ महीने जिसे कोख में दी जगह
नौ घड़ी साथ खातिर तरसती रही/10/
गैर कांधो पे अर्थी उठी माई की
भाईयों बीच अनबन थी चलती रही/11/
चीखती कागजों पर तरक्की यहाँ
चुप लगा के हकीकत सिसकती रही/12/
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