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उमीद का इक दिया जला, है बहुत अँधेरा
कहीं से जुगनू ही मांग ला, है बहुत अँधेरा/1/
जले है ईर्ष्या की आग सबके ही मन के भीतर
कि जामे उल्फत इन्हें पिला, है बहुत अँधेरा/2/
नमी है आंखों में आज जाने क्यूँ सुब्ह से ही
गया जो उसको तू भूल जा, है बहुत अँधेरा/3/
हुआ करे है अगर जो चारों तरफ हमारे
न मुश्किलों से हमें डरा, है बहुत अँधेरा/4/
उधार की रौशनी में कैसा मचल रहा है
ऐ चांद अपनी न हद भुला, है बहुत अँधेरा/5/
मचल रही बिजलियाँ चमकदार पैरहन में
चिराग खामोश दिख रहा, है बहुत अँधेरा/6/
हमें मुहब्बत की एक भी वज्ह मिल न पायी
तू रूठने की वजह बता, है बहुत अँधेरा /7/
ये अश्क आंखों से यूँ नही बस निकल हैं आए
उतावला मन मचल रहा, है बहुत अँधेरा/8/
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