22 22 22 22 22 2
दिन भी कब कहिये दिन जैसा लगता है
इसमें भी किस्मत का धोखा लगता है/1/
नाम नही लेती है रात गुजरने का
भूल गया सूरज भी रस्ता लगता है/2/
निश्चित आंखें बरसी होंगी रात भर
माँ का पल्लू भीगा भीगा लगता है/3/
यूँ तो तुमसे बात बहुत सी कहनी है
कभी-कभी चुप रहना अच्छा लगता है/4/
उम्मीदों से ही उम्मीदें रहतीं हैं
उम्मीदों से फिर क्यूँ झटका लगता है/5/
दिखने को ही दिखती है सेहत अच्छी
भीतर से कमजोर शिकस्ता लगता है /6/
मरता है ना जीता है मध्यम तबका
सांसे जब लेते हैं डर सा लगता है/7/
सूरज के पीछे शायद अंधियारा हो
सूरज बस आगे से उजला लगता है/8/
मृगतृष्णा के पीछे भागे फिरता है
हर बंदा ही पगलाया सा लगता है/9/
सारे रावण घर के भीतर से निकले
घर घर ही रावण का डेरा लगता है/10/
बस तमगों से पेट नही भरता साहब
जिंदा रहने को तो निवाला लगता है/11/
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