Monday, 7 February 2022

कुछ नया अब नही जिंदगी के लिए

212 212 212 212 
कुछ  नया  अब नही  जिंदगी के लिए 
जब मिली बस मिली दो घड़ी के लिए /1/

कर  रहे हैं  मलामत   वही  खौफ़ का
जो  रहे  नामची   खौफ़  ही  के  लिये/2/

थक  गयी  भूख से लड़ते नन्ही कली
सोने  दो   चैन  से   दो घड़ी  के लिए/3/

बन रहा जो खुदा था वो पत्थर कभी
वक़्त रहता न इक सा किसी के लिए/4/

चाहिए   एक  किरदार  हो  इस तरह 
कर दे  मजबूर  सबको हँसी के लिए/5/

आज खेमों में  दिखने लगी है कलम
कशमकश है  बहुत  लेखनी  के लिए/6/

है ये जाहिर  अलग हूँ  मैं तुझसे मगर
कर  तू  साबित  जुदाई  घड़ी के लिए/7/

शोर  करती  हैं   तन्हाईयाँ  भी  बहुत
हमसफ़र  चाहिए  इक  सभी के लिए/8/

ना  लगाया  कभी  ना  मिटाया  कभी
एक  नंबर   रखा है   खुशी   के  लिए/9/

है  सियासत  के  खातिर जरूरी बहुत
मुल्क  जलता  रहे  रोज़  ही  के  लिए/10/

जी  भरा  और  खाली  लगे मन अगर
खुद से लग खुद गले दो घड़ी के लिए/11/

खा  गया  हर  कदम  पर भरोसा मुझे
अब बचा मैं न कुछ भी किसी के लिए/12/

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