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जब भी मिले हैं बस वही बेकार की बातें
बे वज्ह की फिजूल की तकरार की बातें /1/
होती नही है चर्चा कोई अम्नो सुकून की
अरसे से सुनी ही नही है प्यार की बातें /2/
बेरंग सी लगने लगी हैं अब तो फिजाएँ
मिलती कहाँ है सुनने को गुलजार की बातें /3/
बस्ती का वो चुल्हा भी तो अवकाश पे है अब
कैसे वहां पे हो कोई त्योहार की बातें /4/
फुटपाथ पे होती है बसर जिंदगी लाखों
सुन रक्खी है हमने बहुत घर बार की बातें /5/
दिन रात बदलते ही बदल जाते हैं किरदार
कैसे भला हो अब कहीं किरदार की बातें /6/
वादे ही खिलाती है हुकुमत तो हमेशा
हर बार लगी झूठ है सरकार की बाते/7/
चलती है रसूखदार की हर दौर में हर वक़्त
सुनता है भला कौन ये लाचार की बाते/8/
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