2122 1122 1212 22
दौर इक ऐसा भी गुजरा है गुजरे सालों में
गिनतियाँ होती थी औकात भी निवालों में/1/
पेट के वास्ते टुकड़े जिगर के बिकते थे
जिंदा रहने की हर इक शय थी बंद तालों में/2/
वक़्त गुजरा न जियादा है याद हो शायद
आग भड़की थी कभी बेहिसाब दालों में/3/
आपके घर में तबाही मचा वो जाते थे
मांगते आप मदद थे जहान वालों में /4/
हादसे रोकना अब बस में ना हमारे है
जिम्मेदारों के बयानात थे बवालों में/5/
गोभी गमलों में हुनर मंद कुछ उगाते थे
शक्लें पहचानी न जाती रही उजालों में/6/
कोठियों पर चढ़ी जाती थी कोठियाँ हर दिन
मौज़ करती थी गरीबी फकत खयालों में/7/
भूलने की रही फितरत है तेरी सदियों से
भूल जाता है अंधेरा जरा उजालों मे/8/
गलतियाँ होगीं यकीनन कहीं पे लाजिम है
पर न बदलाव दिखा क्या तुम्हें कुछ हालों में/9/
No comments:
Post a Comment