122 122 122 122
अभी सर पे इल्ज़ाम आने बहुत हैं
न घबराइये चोट खाने बहुत हैं /1/
निकल यार लेंगे बहाने बना कर
हमारे हितैषी सयाने बहुत हैं/2/
नयी बात कोई जरा छेड़ अब तूं
गिले शिकवे तेरे पुराने बहुत हैं/3/
तुझे हाले-दिल हम बताएंँ भी कैसे
ये महफ़िल में तेरे दिवाने बहुत हैं/4/
नही वस्ल की मिल रही वज्ह कोई
बिछड़ने के लेकिन बहाने बहुत हैं/5/
मिला बरहना जिस्म फिर सर्दियों में
बने कागजी शामियाने बहुत हैं/6/
हुई नज़्र बलवों की इंसानियत फिर
इक अफवाह हुडदंग मचाने बहुत हैं /7/
ये दैरो हरम को पता भी नही है
जली उनकी खातिर दुकानें बहुत हैं/8/
न कर जल्दबाजी किसी फैसले पर
कि किरदार अभी आजमाने बहुत हैं /9/
जरूरी नही हर नजरिया सही हो
स्वघोषित यहाँ आस्तानें बहुत हैं/10/
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