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सहर से शाम तक रूठा हुआ है
जरा सी बात थी ऐसा भी क्या है/1/
शरारत जिंदगी में है जरुरी
मनाना रुठना तो खेल सा है/2/
शिकायत हर घड़ी अच्छी नही है
खुशी गम जिंदगी का फलसफा है/3/
ये जो हर बात पर लड़ते हो हमसे
बताओ क्या हमारा राब्ता है/4/
पड़ी है उम्र लड़ने के लिए तो
मुहब्बत आज कर लो क्या बुरा है/5/
नजर भर देख लें इक बार तुझको
यही बस आखिरी दिल की रजा है /6/
सिरा इक वक़्त का खींचा जरा तो
परत दर हर परत खुलने लगा है/7/
गुजारा है जो हंस हंस कर के हमने
मुसलसल खौफतर मंजर रहा है/8/
छिपा कर दर्द जो रक्खा सभी से
हरा हर जख्म फिर से हो रहा है/9/
छलकने की वजह तो दो कोई अब
समंदर आंख में ठहरा हुआ है/10/
गुजरती जाती है ये उम्र हर पल
बस इक लम्हा यहाँ अटका पड़ा है/11/
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