2122 2122 2122 2122
कब समय बदले दिखे मुख पर हँसी कुछ पल हठेली
कब ढलेगी रात सज धज सुबह आएगी नवेली
और कितनी वेदनाओं से हमारा सामना है
और कब तक यूँ अभावों की डगर को साधना है
और कितने कष्ट सह कर नेह सब में बांटना है
और कब तक जिंदगी यूँ ही रहे बन कर पहेली
कब ढलेगी रात सज धज आएगी सुबह नवेली
मन व्यथाओं में घिरा रहता सदा उलझा हुआ सा
भागता प्रतिबिंब के पीछे पकड़ने को ठगा सा
लग रहा है अब बहुत ही अनमना सा कुछ थका सा
थक चुकी है कर प्रतीक्षा देह भी अविरल अकेली
कब ढलेगी रात सज धज आएगी सुबह नवेली
थी हृदय में कामनाएँ तो हमारे भी जरा सी
स्वप्न थे उन्मुक्त अंबर में विचरने की हवा सी
पड़ गयी भारी सुहाने स्वप्न के ऊपर उदासी
नीर बन कर बस नयन से भावना बहती सहेली
कब ढलेगी रात सज धज आएगी सुबह नवेली
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