Monday, 7 February 2022

कब समय बदले दिखे मुख पर हँसी कुछ पल हठेली

2122 2122 2122 2122 
कब समय बदले दिखे मुख पर हँसी कुछ पल हठेली
कब  ढलेगी   रात   सज धज  सुबह  आएगी  नवेली

और   कितनी     वेदनाओं  से     हमारा    सामना है
और  कब तक  यूँ  अभावों की  डगर को   साधना है
और  कितने   कष्ट  सह कर    नेह  सब में  बांटना है

और  कब तक  जिंदगी  यूँ  ही  रहे   बन कर  पहेली
कब  ढलेगी  रात    सज धज आएगी    सुबह नवेली

मन  व्यथाओं  में  घिरा रहता  सदा  उलझा हुआ सा
भागता   प्रतिबिंब  के  पीछे   पकड़ने  को   ठगा सा 
लग रहा है अब बहुत ही  अनमना सा कुछ थका सा

थक  चुकी है  कर  प्रतीक्षा  देह भी अविरल अकेली
कब  ढलेगी रात    सज धज आएगी    सुबह नवेली 

थी  हृदय में   कामनाएँ   तो     हमारे भी    जरा सी 
स्वप्न थे    उन्मुक्त  अंबर में     विचरने की   हवा सी
पड़  गयी  भारी     सुहाने  स्वप्न के  ऊपर    उदासी

नीर  बन कर  बस नयन से   भावना  बहती  सहेली
कब ढलेगी रात    सज धज आएगी    सुबह नवेली

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