Monday, 7 February 2022

थी हमारी चाह ऐसी हमें गम मिले जरा सा

1121 2122 1121 2122 
थी  हमारी  चाह  ऐसी   हमें   गम  मिले जरा सा 
मिला गम हमें फिर इतना कि न हम बचे जरा सा /1/

कभी रोये दिल ही दिल में  कभी आंसू हम बहाए 
कभी गम छिपाने  हँसते से भी हम दिखे जरा सा /2/

कभी जान कर  हकीकत   रहे  ख्वाब में ही खोये 
टूटे  ख्वाब सब  कदम जब पड़े शम्स के जरा सा /3/

कहें  अब  कसूर  किसका   ये  नसीब  है  हमारा
सभी  लोग  अच्छे हैं  बस  बुरे हम ही थे जरा सा /4/

हम उठाये  नाज  उनके    हैं सदा ही हंसते हंसते 
हो गये  खफा  जो  किस्से    सुने दर्द के जरा सा /5/

सभी  पूछते हैं  हमसे    इन उदासियों  के किस्से 
किसी को  न  दर्द दिखता कभी चेहरे पे जरा सा /6/

उन्हे  तो  लगे है  अपने  दिये हर सितम ही थोड़े 
तभी  हैं  सताते  ज्यादा   और   पूछते   जरा सा /7/

हमें कह रहें वो कच्चे  अभी हो बहुत ही दिल के 
किया  इश्क  है  अगर  तो  रहो  दर्द में  जरा सा/8/

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