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मिलता नही है अब कही खालिस ये आदमी
हर आदमी से रखता है रंजिश ये आदमी/1/
जीवन के रंग आज यूँ रंगीन हो गये
लगता है जैसे कोई नुमाइश ये आदमी/2/
गम सारे झेलते हुए गमख्वार हो गया
करता हर एक गम की निगारिश ये आदमी/3/
निकले जो सुब्ह शाम तलक लौटता है वो
क्या जुस्तजू है करता है काविश ये आदमी/4/
सहमी दबी सी रहती है दिल में ही वो कहीं
जाहिर न कुछ भी करता है ख्वाहिश ये आदमी/5/
रातें सियाह सी बड़ी लंबी लगी है अब
करने लगा उजाले गुजारिश ये आदमी*6/
हर दिन निकल रहे हैं जनाजे उसूल के
गैरत की सबसे करता है पुर्सिश ये आदमी/7/
गमख्वार - हमदर्द
निगारिश - लेखन वर्णन
जुस्तजू - तलाश
काविश - प्रयास कोशिश
पुर्सिश - पुछताछ
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