2122 2122 2122 212
जिंदगी अब रोज़ की फुर्सत से उकताई बहुत
हर दफा रूसवाईयों से भी है कतराई बहुत/1/
हौसला भी है बहुत जज्बात भी बे इंतिहा
जाने क्यूँ पर हर कदम पर ही है लरजाई बहुत/2/
कुछ दरारें आ गई है दरमियाँ रिश्तों के अब
खार अब खाने लगे हैं भाई से भाई बहुत/3/
घर के बीचों बीच इक दीवार कर दी है खड़ी
रिश्तों के बंटवारे से बस मां ही पछताई बहुत/4/
यूँ तो हमको जिंदगी ने रोज ही भरमाया है
हर दफा तेवर बदल करके नये आई बहुत/5/
चांद अक्सर दूर ही मेरी पहुंच से है रहा
छूने की ख्वाहिश मेरी बेकार पछताई बहुत/6/
दे के न्यौता है नदारद जिंदगी से जिंदगी
इस अदा पर जिंदगी फिर मुझसे कतराई बहुत/7/
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