22 22 22 22 22 22 22 2
देख तमाशा रोज नया सा खौफ़ सा भीतर बैठ गया
सोग नया हर दिन रो रो कर जी में पत्थर बैठ गया/1/
शोर सिसकियाँ कोलाहल है रुदन चारो ओर मचा
भीग के अश्रू धाराओं में सारा मंजर बैठ गया/2/
भाग रहे पहलू में धरकर सांसो का सामान सभी
देख के लाचारी लोगों की मन में इक डर बैठ गया/3/
वक़्त सभी का आता है अभिमान धरा रह जाता है
धरती की प्यास बुझाने खातिर देखो अंबर बैठ गया/4/
दावों के प्रतिदावों के भी सांसे उखड़ते देखा है
सिस्टम है वेंटीलेटर पर दिल गश खाकर बैठ गया/5/
चीर बचाने कलयुग में अब कोई कृष्ण न आयेंगे
शस्त्र उठाया जब नारी ने शत्रु फिर डर कर बैठ गया/6/
नर पिशाचों की बस्ती में रक्त पिपासु है चहूंओर
सहमा सहमा बेबस इंसा ओढ़ के चादर बैठ गया/7/
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