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तुरपाईयाँ लिबास की उधड़ी कहांँ कहांँ
उधड़ी है कुछ यहाँ से तो उधड़ी है कुछ वहाँ /1/
धागे पिरो के अश्कों के सी ते हैं गम सभी
पैबंद कहकहों का लगा के जहांँ तहाँ /2/
अब तो जरा सी आंच में रिश्ते झुलस रहे
बर्दाश्त अब न होती किसी को भी तल्ख़ियाँ /3/
बढ़ से गये हैं आजकल यारों के कद बहुत
उबने लगे हैं देख के मुफलिस के वो निशाँ/4/
मेला लगा है खुशियों का बाहर तो जिस्म के
भीतर जिगर सुलग रहा सब है धुआँ धुआँ /5/
सासों को छू के गुजरी है कोई महक अभी
पीछे ही उनके चल पड़े अश्कों के कारवाँ /6/
जिस रौ चली हवाएँ हैं उस रौ ही बह गये
हमको नही है कोई भी शिकवा गिला मियांँ/7/
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