212 212 212 212
हर तरफ़ कहर है सुर्खियाँ कुछ नही
जल रहा शहर है पर धुआँ कुछ नही/1/
खौफ़ मातम है पसरा हुआ हर तरफ
मौन है फिर भी कहती जुबाँ कुछ नही/2/
हर कदम कशमकश और जद्दोजहद
दर्दों गम की भी हद ही कहाँ कुछ नही/3/
हर मआनी बदल देती है खामुशी
फिर भी बोला किसी ने यहाँ कुछ नही/4/
रह गयी रोटियों तक सिमट जिंदगी
मर गयी ख्वाहिशें अब कहाँ कुछ नही/5/
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